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October Movie Review: बेमौसम ‘अक्‍टूबर’ में आए वरुण धवन, क्‍या यूथ को पसंद आएगा उनका ये अंदाज…

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इस फिल्म में वरुण धवन डेन नाम के लड़के का किरदार निभा रहे हैं जो एक द‍िल्‍ली के होटल में हाउस कीपिंग का काम करता है। कुछ नया करने की कोश‍िश करने वाले शुजीत सरकार ने इस फ‍िल्‍म के माध्‍यम से अप्रैल की गर्मी में अक्‍टूबर की ठंडक का अहसास कराने की कोश‍िश की है।

बॉलीवुड के जाने-माने डायरेक्‍टर शुजीत सरकार की फ‍िल्‍म ‘अक्‍टूबर’ स‍िनेमाघरों में दस्‍तक दे चुकी है। आम व‍िषयों से अलग कुछ नया करने की कोश‍िश करने वाले शुजीत ने इस फ‍िल्‍म के माध्‍यम से अप्रैल की गर्मी में अक्‍टूबर की ठंडक का अहसास कराने की कोश‍िश की है। फ‍िल्‍म में बॉलीवुड अभ‍िनेता वरुण धवन और लंदन के क‍िंग्‍स कॉलेज ने इंग्‍ल‍िश ल‍िटरेचर की स्‍टूडेंट बन‍िता संधू प्रमुख भूम‍िकाओं में हैं। फ‍िल्‍म क‍िसी शांत नदी की तरह आगे बढ़ती है, लेक‍िन अक्‍टूबर का अहसास कराने में नाकामयाब रहती है। देखना होगा क‍ि आज का यूथ वरुण धवन को ज‍िस कॉमेडी-एक्‍शन हीरो के रूप में जानता है, उसको ये अवतार पसंद आएगा या नहीं? ये फ‍िल्‍म बहुत धीरे धीरे आगे बढती है वरुण धवन का लुक और एक्‍ट‍िंग प्रभाव छोड़ता है। बैक ग्राउंड म्‍यूज‍िक शानदार है, जो आपको भावनाओं में बांधे रखता है।

कहानी: इस फिल्म में वरुण धवन डेन नाम के लड़के का किरदार निभा रहे हैं जो द‍िल्‍ली के होटल में हाउस कीपिंग का काम करता है। बनिता भी इसी होटल में काम करती हैं और वह श‍िवली नाम की लड़की की भूमिका निभा रही हैं। फ‍िल्‍म की शुरुआत वरुण धवन से होती है। वरुण धवन क‍िसी शरारती स्‍टूडेंट की तरह काम करते हैं और परेशान‍ियां खड़ी करते हैं। उनके रवैये की वजह से होटल मैनेजर उन्‍हें कई बार चेतावनी भी देता है।

वरुण धवन की गैरमौजूदगी में होटल का स्‍टाफ न्‍यू ईयर पार्टी करता है और इसी पार्टी में श‍िवली तीसरी मंज‍िल से नीचे ग‍िर जाती है। उसकी हालत कोमा के मरीज की तरह हो जाती है, जो न सुन सकता है, न समझ सकता है। ग‍िरने से पहले बस वो पूछती है ‘व्‍हेयर इज डेन’। इस फ‍िल्‍म में बन‍िता का बस ये ही एक डायलॉग है। वरुण धवन सब कुछ भुलाकर इस सवाल का जवाब पाने के ल‍िए श‍िवली के हॉस्‍प‍िटल के चक्‍कर लगाते हैं और उसे ठीक करने की कोश‍िश करते हैं। श‍िवली धीरे धीरे र‍िकवर करती है, लेक‍िन ब‍िना कुछ बोले एक द‍िन इस दुन‍िया से चली जाती है यही इस फ‍िल्‍म की कहानी है।

बनीता संधू की इस Ad को मिले थे 4 करोड़ व्‍यूज , ऐसे बनीं वरुण धवन की October की हिरोइन

फ‍िल्‍म एक नजर में
फ‍िल्‍म: अक्‍टूबर
कास्‍ट: वरुण धवन, बन‍िता संधू
डायरेक्‍टर: शुजीत सरकार
रन‍िंग टाइम: 2 घंटे लगभग
रेट‍िंग: 2.5/5

र‍िव्‍यू: पूरी फ‍िल्‍म में कई सवाल छूट जाते हैं। न तो इसका जवाब म‍िलता है क‍ि श‍िवली ने डेन के बारे में क्‍यों पूछा, न ये साफ होता है क‍ि र‍िकवर होते हुए वो अचानक मर क्‍यों गई। न इस फ‍िल्‍म में बेपनाह मोहब्‍बत है और न ये कोई अनोखी मोहब्‍बत है। कोहरा द‍िखाकर अक्‍टूबर महीने की पहचान कराई जाती है, उसके अलावा ऐसा कुछ नहीं है ज‍िससे सर्दी का अहसास हो। हां बीच बीच में वरुण धवन के चुटीले डायलॉग हंसी द‍िलाते हैं, लेक‍िन वो ज्‍यादा देर तक उसे रोक पाने में नाकामयाब रहते हैं। फ‍िल्‍म के रंग और फ‍िल्‍मांकन अच्‍छा है, ज‍िसके ल‍िए शुजीत सरकार जाने जाते हैं। फ‍िल्‍म का म्‍यूज‍िक सामान्‍य है फ‍िल्‍म देखने के बाद म्‍यूज‍िक आपके जुबां पर नहीं चढ़ेगा।

इसल‍िए नाम रखा अक्‍टूबर
श‍िवली को हर साल अक्‍टूबर महीने का इंतजार रहता है क्‍योंकि इस महीने में हरसिंगार के फूल ख‍िलते हैं। श‍िवली को ये फूल बहुत प्र‍िय होते हैं वरुण धवन उसके ल‍िए ये फूल चुनकर लेके जाते हैं। फ‍िल्‍म के अंत में जब श‍िवली इस दुन‍िया को अलव‍िदा कह जाती है, तो श‍िवली की मां वरुण धवन को ये बात बताती हैं। फ‍िल्‍म देखते हुए आप ये सोचते है क‍ि अक्‍टूबर का इस फ‍िल्‍म से क्‍या ताल्‍लुक है, जिसका जवाब आपको फ‍िल्‍म खत्‍म होने से पहले म‍िल जाती है। श‍िवली के आंगन में हरस‍िंगार का पौधा होता है, ज‍िसे वरुण धवन अपने घर हमेशा के ल‍िए ले जाते हैं।

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Nanu ki Jaanu Movie Review : जान नहीं है इस जानू में…

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अभय देओल 2016 में हैप्‍पी भाग जाएगी में नजर आए थे और फ‍िर इसके बाद वह स्‍क्रीन से ऐसे भागे कि अब जाकर नानू की जानू में नजर आए हैं। इस फ‍िल्‍म में अभय चोरों के गैंग के सरगना के रोल में हैं और शायद इस उम्‍मीद में भी होंगे कि फिल्‍म उनके लिए ओए लकी लकी ओए वाली सफलता लेकर आएगी। इस फ‍िल्‍म में भी अभय देओल चोर बने थे और यह दर्शकों की कसौटी पर खरी उतरी थी। लेकिन Nanu ki Janu के साथ ऐसा लगता नहीं है कि अभय के कर‍ियर के लिए ये फ‍िल्‍म कुछ खास कर पाएगी।

नानू की जानू में लीड रोल कर रहीं पत्रलेखा इससे पहले सिटीलाइट्स में खुद को साबित कर चुकी हैं। उनके अभ‍िनय ने सभी को इंप्रेस किया था लेकिन अभय के साथ वह ऐसी कहानी नहीं जमतीं जिसमें एक गुंडे से भूत को प्‍यार हो जाए। पत्रलेखा को अपने को लेकर जरूर गहराई से सोचना चाहिए। वैसे नानू की जानू के डायरेक्‍टर फराज हैदर ने जब इसका कॉन्‍सेप्‍ट तैयार होगा तो बेशक ये मजाकिया फ‍िल्‍म होगी। लेकिन कहानी पर काम ठीक से हुआ नहीं और इस फ‍िल्‍म को देखना खुद में एक मजाक बन गया। ऐसी फ‍िल्‍मों में अक्‍सर वन-लाइनर्स मजबूत होने चाह‍िए लेकिन फ‍िल्‍म सबसे ज्‍यादा इसी पॉइंट पर‍ न‍िराश करती है।

अभय देओल के साथ मनु ऋष‍ि को बतौर उनका सहयोगी पेश करना यही दिखाता है क‍ि मेकर्स नानू की जानू में ‘ओए लकी’ वाला चार्म डालना चाहते थे। मगर सफल नहीं हो सके। फ‍िल्‍म में परेश रावल जैसे कलाकार की कमी भी खूब खलती है। नानू की जानू में जान डालने की कोश‍िश सपना चौधरी के आइटम नंबर से भी की गई है लेकिन जब स्‍क्र‍िप्‍ट और निर्देशन में ही धड़कन न हो तो भला फ‍िल्‍म चलेगी कैसे। ‘ओए लकी’ की तुलना में नानू की जानू का म्‍यूजिक भी बेहद कमजोर है।

कुल मिलाकर देखा जाए तो इस वीकएंड रिलीज होने वाली 5 फ‍िल्‍मों में से दो की रिलीज डेट ख‍िस‍क जाने का फायदा अभय देओल को नहीं मिलेगा। अगर उनको वापस पर्दे पर लौटना है तो अपने प्रोजेक्‍ट्स को लेकर उनको और सीरियस होना होगा। इसी को देखते हुए हम नानू की जानू को 2 स्‍टार दे रहे हैं।

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3 Storeys Review – रिश्तों का शानदार ताना बाना, बांधे रखती है यह कहानियां…

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हर मास्क के पीछे एक चेहरा होता है और उस चेहरे के पीछे होती है एक कहानी – मार्टिन रूबीन की ये लाइन इस फिल्म पर बिल्कुल सटीक बैठती है। डेब्यू डायरेक्टर अर्जुन मुखर्जी की 3 स्टोरीज में हमारे लिए भी बरुत कुछ है। फिल्म के डायरेक्टर से जब फिल्म की शैली के बारे में पूछा गया था तो उन्होंने कहा था ऑनियन शैली। मानना पड़ेगा कि वो अपनी बात पर बिल्कुल सटीक साबित हुए हैं। फिल्म के सब प्लॉट में भी परत दर परत बहुत कुछ है और यही आपके फिल्म से बांधे भी रखेगी। फिल्म के तीनों कहानियों के बीच अर्जुन मुखर्जी ने अच्छा सामंजस्य बिठाया है और तीनों के बीच कनेक्शन भी वाकई काफी खूबसूरती से दिखाया गया है।

मुंबई के एक चॉल में 3 मंजिल के अपार्टमेंट में तीन कहानियां हैं। सबकी जिंदगी बिल्कुल सिंपल दिखती है लेकिन आप सावधान रहें क्योंकि उनके सीक्रेट से आप बिल्कुल अनजान हैं। फिल्म की पहली कहानी एक एंग्लो इंडियन विधवा फ्लोरी मेनडोन्का उर्फ मेनडोन्का (रेणुका शहाणे) की है। वो अपने एक छोटे फ्लैट की अधिक कीमत मांगने से नहीं हिचकिचाती हैं और जल्द ही उन्हें एक खरीददार भी मिल जाता है।फिल्म की दूसरी कहानी वर्षा (मासुमेह मखीजा) की है जो प्रेमहीन और बुरी शादी में फंसी हुई है। उसकी जिंदगी में खतरनाक मोड़ तब आता है जब उसकी मुलाकात पूर्व प्रेमी (शरमण जोशी) से होती है।इनकी ये कहानी भी आपको आखिरी पल तक बांधे रखेगी।

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अंत में दो यंग प्रेमी हैं एक मुस्लिम लड़का सोहेल (अंकित राठी) और हिंदु लड़की मालिनी (आएशा अहमद) जो अपनी प्रेम कहानी को हैप्पी एंडिंग देना चाहते हैं।चूंकि ये सभी एक दूसरे के साथ एक ही बिल्डिंग में रहते हैं इसलिए ये सभी किरदार खुद को एक दूसरे से जुड़ा हुआ पाते हैं।दुनिया के लिए भले वो कुछ और हैं लेकिन पास से देखने पर पता चलता हैकि हर किसी का एक अतीत है।3 स्टोरीज से अर्जुन मुखर्जी ने बतौर डारेक्टर शानदार और कॉन्फिडेंट डेब्यू किया है।हर कहानी के साथ उन्होंने एक ट्विस्ट रखा है। हालांकि अगर मुझसे पूछा जाए तो रेणुका शहाणे और पुलकित सम्राट की कहानी हल्की ट्विस्ट के साथ कापी अच्छी है। फिल्म में शानदार परफॉर्मेंस की वजह से आपकी नजरें स्क्रीन पर से नहीं हटेंगी।

रेणुका शहाणे ने फ्लोरी मेन्डोन्का के किरदार को बखूबी निभाया है।वो आपको कभी अच्छी लगेंगी तो कभी चौंका देंगी। पुलकित सम्राट दिल्लीवाला स्वैग को छोड़कर अपने किरदार को बखूबी निभाने में सफल हुए हैं।मासुमेह माखजी हाउसवाइफ के किरदार में काफी अच्छी लगी हैं और अपनी छाप छोड़ने में सफल भी हुई हैं। शरमण जोशी भी हमेशा की तरह अच्छी परफॉर्मेंस देने में सफल हुए हैं। डेब्यू एक्टर अंकित राठी और आएशा अहमद भी काफी प्रॉमिसिंग लगे हैं।

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ऋचा चड्डा फिल्म में अपनी सिड्क्टिव को दिखाने में सफल हुई हैं और उनका किरदार भी आपको पसंद आएगा। 115 मिनट की फिल्म 3 स्टोरीज आपका अटेंशन पाने में सफल होती है और इसका कारण है प्रभावशाली कहानी और परफॉर्मेंस। अर्जुन मुखर्जी ने फिल्म में जबरदस्ती गाने को डालने की कोशिश नहीं की है जो उनके पक्ष में काम करती है। ज्यादातर समय बैकग्राउंड स्कोर और ही सारा काम कर देती है। इसके अलावा अलग से दिखाया गया गाना ‘आजादियां’ आपके दिमाग में लंबे समय तक रहेगा।

3 स्टोरीज एक दिलचस्प फिल्म है जिसकी में हर वो चीज है जो अटेंशन पाने के लिए एक फिल्म को चाहिए। ये थाली में परोसा एक ऐसा खाना है जो आपको तृप्ति देगी।

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