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जीवन शैली

हां मैं देसी हूं! मुझे पिज़्ज़ा-बर्गर से ज़्यादा घर का दाल-चावल पसंद है.

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आजकल दोस्तों के साथ पार्टी हो या फ़ैमिली के साथ बाहर जाकर खाना पिज़्ज़ा-बर्गर सबकी पहली पसंद बन चुके हैं. पिज़्ज़ा, बर्गर, चाइनीज़ और कई तरह के जंक फ़ूड के नाम से आजकल बच्चे हों या बड़े सबके मुंह में पानी आ जाता है. बाहर खाना हो तो बच्चे पिज़्ज़ा, बर्गर की तरफ ही भागते हैं. ऐसा ही कुछ मेरे परिवार में भी है. जब भी हम सारे भाई-बहन इकट्ठे होकर कहीं बाहर खाने जाने का प्लान बनाते हैं, तो सबसे पहले खाने के लिए जो डिमांड होती है वो पिज़्ज़ा, बर्गर, चाइनीज़ आदि की ही होती है. लेकिन मेरी पसंद होती है घर का दाल-चावल. लेकिन ऐसा बिलकुल नहीं है कि मुझे ये सब चीज़ें पसंद नहीं हैं.

Source: amazonaws

अपने दोस्तों और कज़न्स के साथ मैं ये सब चीज़ें खा भी लूं, लेकिन अगर मेरी पसंद के बारे में पूछा जाए तो अगर मेरे सामने एक तरफ जीरा-हींग का छौंका लगी दाल, चावल, रोटी और सब्ज़ी हो और दूसरी तरफ ये सारे जंक फ़ूड, तो मैं घर का सादा दाल-चावल खाना पसंद करूंगी. हां, मैं होटल या रेस्टोरेंट में मिलने वाले दाल-चावल को भी पिज़्ज़ा-बर्गर के सामने ज़्यादा स्वाद से खाऊंगी। क्योंकि मैं देसी हूं और मुझे देसी खाना ही पसंद है. और मुझे इसमें कोई बुराई नज़र नहीं आती.

Source: blogspot

मेरी इस बात पर मेरे दोस्तों का कहना होता है,

जब तू हमारे साथ आया कर तो अपना डिब्बा घर से ही लाया कर…

हम सब तो पिज़्ज़ा ही खाएंगे…

तू खुश रह अपने दाल-चावल में!

अगर हम बात करें मां के हाथ के खाने की, तो मैं यहां एक बात कहना चाहूंगी कि हर किसी को अपनी मां के हाथ का खाना याद होगा जिसमें दाल-चावल तो होता ही था. आखिर बचपन से मम्मी के हाथ के बने दाल-चावल और सब्ज़ी-रोटी खाकर ही तो हम बड़े हुए हैं. उसे कैसे भूल सकते हैं. घर का खाना जितना पौष्टिक और सेहतमंद होता है, बाहर मिलने वाला पिज़्ज़ा-बर्गर नहीं होता. अब अगर स्वाद की बात की जाए तो भी मैं यही कहूंगी कि साधारण सी दाल और चावल में जो स्वाद होता है, वो पिज़्ज़ा-बर्गर जैसे पैकेज़्ड फ़ूड में नहीं.

Source: watscooking

हालंकि, बहुत सारे पिज़्ज़ा, बर्गर लवर्स को मेरी ये बात सुनने के बाद ख़राब लगा होगा और वो मुझे पुराने ज़माने का या फिर बैकवर्ड समझें लेकिन मुझे इससे फ़र्क नहीं पड़ता कि वो मेरे बारे में क्या सोचेंगे या बोलेंगे. हां मुझे घर का बना दाल-चावल ही पसंद है और उसके आगे मैं ये विलायती खाना बेझिझक छोड़ सकती हूं. और मैं ऐसा क्यों न करूं?

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जीवन शैली

रोज आलू खाने वाले 99% लोग इस बात को बिल्कुल भी नहीं जानते होंगे, अभी पढ़ लें बहुत जरूरी है…

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क्या आप भी रोज आलू खाते हैं, अगर हां तो इस बात को आपको जरूर जानना चाहिए वरना आपका ही नुकसान है स्वाद और सेहत के लिए आप आलू तो खाते ही होंगे लेकिन क्या आपने कभी आलू का छिलका खाने के बारे में सोचा है? अगर अब तक नहीं सोचा है तो अब सोचिए। ज्यादातर घरों में आलू को छिलने के बाद छिलके को कूड़े मे फेंक दिया जाता है। लेकिन अगर आप आम के आम और गुठलियों के दाम वसूलना चाहते हैं तो आलू के साथ ही उसके छिलके को भी यूज करना शुरू कर दें।

जितनी बार भी आपके घर में आलू की सब्जी बने, छिलके को कंज्यूम करें। आलू के छिलके को अलग-अलग तरह से यूज करके आप बहुत सी बीमारियों से सेफ रह सकते हैं और मेडिसिन का खर्च भी बचा सकते हैं। आप सोच रहे होंगे कि आलू के छिलकों को कंज्यूम कैसे किया जाए। आलू के छिलकों को उबालकर कंज्यूम किया जा सकता है।
आपने अगर अब तक ये ट्राई नहीं किया है तो आपको बता दें कि आलू के छिलके खाने में बुरे नहीं लगते और इनका अरोमा भी काफी अच्छा होता है। अब जानते हैं आलू के छिलके को खाने से क्या-क्या फायदे हो सकते हैं

 

1- ब्लड प्रेशर को रेग्युलेट करने के लिए 
आलू में अच्छी-खासी मात्रा में पोटैशि‍यम पाया जाता है। पोटैशियम ब्लड प्रेशर को रेग्युलेट करने में हेल्प करता है।

2-मेटाबॉलिज्म के लिए भी अच्छे हैं छिलके 
आलू के छिलके मेटाबॉलिज्म को भी सही रखने में मददगार हैं। एक्सपर्ट्स की मानें तो आलू के छिलके खाने से नर्व्स को मजबूती मिलती है।

3-एनीमिया से सेफ रखने में  
अगर आप आयरन की कमी से जूझ रहे हैं तो बाकी सब्ज‍ियों के साथ आलू के छिलके खाना बहुत फायदेमंद रहेगा। आलू के छिलके में आयरन की अच्छी मात्रा होती है जिससे एनीमिया होने का खतरा कम हो जाता है।

4- आलू के छिलके खाने से आती है ताकत 
आलू के छिलके में भरपूर मात्रा में विटामिन बी3 पाया जाता है। विटामिन बी3 ताकत देने का काम करता है। इसके अलावा इसमें मौजूद नैसीन कार्बोज को एनर्जी में कंवर्ट करता है।

5- फाइबर से भरपूर 
हमारी डाइट में फाइबर की कुछ मात्रा जरूर होनी चाहिए। एक ओर जहां आलू में भरपूर मात्रा में फाइबर पाया जाता है वहीं इसके छिलके में भी अच्छी मात्रा में फाइबर्स होते हैं। ये डाइजेस्ट‍िव सिस्टम को भी बूस्ट करने का काम करता है।

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जीवन शैली

आखिर क्‍यों सजाया जाता है क्र‍िसमस ट्री, ये हैं मान्‍यताएं…

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नई दिल्ली. क्रिसमस में केक और गिफ्ट के अलावा एक और चीज का इस त्योहार में विशेष महत्व होता है, वह है क्रिसमस ट्री। यह एक सदाबहार पेड़ है, जिसकी पत्तियां न तो किसी मौसम में झड़ती हैं और न ही इसमें कभी मुरझाती हैं। हर साल इस त्योहार में घर में लोग क्रिसमस ट्री लगाते हैं। लेकिन क्या आप इसके इतिहास के बारे में जानते हैं।

परिवार वालों की याद में रोपते हैं क्रिसमस ट्री
क्रिसमस ट्री को इंग्लैंड में लोग किसी के बर्थडे, शादी या किसी रिश्तेदार की मृत्यु हो जाने पर भी उसकी याद में रोपते हैं। इसके जरिए वो कामना करते हैं कि इससे पृथ्वी हमेशा ही हरी भरी रहे। प्राचीन इतिहास और कुछ कथाओं से यह भी पता चला है कि क्रिसमस ट्री अदन के बाग में भी लगा था।

ऐसी है प्राचीन कहानी
मान्यताओं के मुताबिक अदन के बाग में लगे क्रिसमस ट्री को हव्वा ने भल को तोड़ा और खाया जिसे परमेश्वर ने खाने से मना किया था, तब इस वृक्ष की वृद्धि रूक गई और पत्तियाँ सिकुड़ कर नुकीली बन गई। कहते हैं कि इस पेड़ की वृद्धि उस समय तक नहीं हुई जब तक प्रभु यीशु का जन्म नहीं हुआ। उसके बाद यह वृक्ष बढ़ने लगा।

Christmas Tree

सोने में बदल गए मकड़ी के जाले
क्रिसमस ट्री के बारे में एक और कथा है कि एक बढ़िया अपने घर देवदार के वृक्ष की एक शाखा ले आई और उसे घर में लगा दिया। लेकिन उस पर मकड़ी ने अपने जाले बना लिए। लेकिन जब प्रभु यीशु का जन्म हुआ था, तब वे जाले सोने के तार में बदल गए थे। इस तरह के सम्बन्ध में अनेक मन्यताएं, कहानियां एवं इतिहास हैं।

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